क्या वयस्क सचमुच बच्चों की तरह ही अच्छी भाषा सीख सकते हैं?
हाँ; बच्चों के पास बस समय अधिक होता है, जबकि एक वयस्क के रूप में आप सोच-समझकर सीखते हैं, इसलिए हर शब्द को ध्वनियों, छवियों और संदर्भ के साथ जोड़ें।
एक भाषा सीखने में आपके बरसों बीत गए हैं। और एक बच्चा, जो ठीक से जूते के फीते भी नहीं बाँध पाता, वह भाषा आपसे बेहतर बोलता है। यह कैसे मुमकिन है? सब कहते हैं कि बच्चे इसमें बेहतर होते ही हैं, और आपका मौका निकल चुका। तो सवाल एक ही बचता है: क्या आपके लिए यह मुमकिन है? और अगर आपकी उस बच्चे से तुलना शुरू से ही ग़ैरबराबरी की थी, तो?
बच्चों के पास एक असली बढ़त ज़रूर है। जीवन के पहले महीनों में शिशु वे ध्वनि-अंतर सुन लेते हैं जो वयस्कों से छूट जाते हैं। पहले जन्मदिन तक, अपनी भाषा में इस्तेमाल न होने वाली ध्वनियों का फ़र्क सुनने की उनकी ज़्यादातर क्षमता खो जाती है। यह मौका वाक़ई मिलता है, मगर थोड़े समय के लिए। यह उम्र भर की महाशक्ति नहीं है। और आपके पास एक विकल्प है जो शिशु के पास नहीं: सोच-समझकर सुनने का अभ्यास करना।
बच्चों की सबसे बड़ी बढ़त समय है: बिना अलग से पढ़े, भाषा के माहौल में बिताए 15,000 से ज़्यादा घंटे। आपके पास यह समय नहीं, नौकरी और ज़िम्मेदारियाँ हैं। तो आपको ऐसे तरीके चाहिए जो हर घंटे ज़्यादा असर करें।
बच्चों के पास ध्वनियाँ पहचानने का छोटा मौका है, और भरपूर समय। पर रणनीति से सीखने की आपकी क्षमता के आगे ये फ़ायदे कम पड़ते हैं। व्याकरण जल्दी समझना, मकसद तय करके पढ़ना और कारगर सिस्टम बनाना आपके हाथ में है। तो यह सवाल छोड़िए कि भाषा सीखना मुमकिन है या नहीं। पूछिए, कैसे।
आपका दिमाग़ किसी शब्द को एक जगह नहीं रखता। वह उसे कई हिस्सों में फैले नेटवर्क की तरह सहेजता है। अनुवाद वाला फ़्लैशकार्ड सिर्फ़ एक पतला कनेक्शन बनाता है: एक विदेशी ध्वनि, हिंदी के एक शब्द से बँधी। लेकिन आपकी अपनी भाषा के शब्द? उनके दर्जनों कनेक्शन होते हैं: आवाज़ों से, तस्वीरों से, भावनाओं से, और जिए हुए पलों से। यही जाल उन्हें बरसों तक टिकाए रखता है। अकेली पतली कड़ी जल्दी टूट जाती है।
एक ही कड़ी से जुड़ी याद कमज़ोर होती है। कई कड़ियों से जुड़ी याद मज़बूत होती है। आपका दिमाग़ शब्दों को 2 माध्यमों से ग्रहण करता है: भाषिक और दृश्य। जो याद दोनों में दर्ज हो, वह ज़्यादा टिकती है। पैवियो ने एक सरल प्रयोग में यह दिखाया। लोगों ने शब्द-सूचियाँ याद कीं। ‘कुत्ता’ जैसे मूर्त शब्द उन्हें ‘इंसाफ़’ जैसे अमूर्त शब्दों के मुक़ाबले लगभग दोगुनी बार याद आए। मूर्त शब्द दोनों माध्यमों को सक्रिय करते हैं, अमूर्त ज़्यादातर एक को। आवाज़, एहसास और अपना अनुभव जोड़िए, तो एक शब्द के दर्जनों कनेक्शन बन सकते हैं, हर एक उस तक लौटने का रास्ता। यही बहु-इंद्रिय एन्कोडिंग है, और इसी तरह पहली भाषा के शब्द याद रहते हैं। ‘कुत्ता’ सुनकर अनुवाद की ज़रूरत नहीं पड़ती: कुत्ता दिखता है, उसका भौंकना सुनाई देता है, रोएँ का स्पर्श याद आता है। हर नए शब्द को ऐसे कई रास्ते दीजिए। इसी मकसद से Synapse में अपने चित्र चुनिए, हर शब्द मातृभाषी की आवाज़ में सुनिए और अपना संदर्भ जोड़िए। हर इंद्रिय से जुड़ा अनुभव उस शब्द तक लौटने का एक और रास्ता बनता है।
भाषा सीखने के लिए आपको किसी ख़ास जीन की ज़रूरत नहीं। किसी विशेष प्रतिभा की भी ज़रूरत नहीं। न विदेश जाकर बसने की, न बचपन से शुरू करने की। वयस्क होना एक बढ़त है। आपको चाहिए सही तरीका और लगातार अभ्यास। अगर आपने पहली भाषा सीखी है, तो आपके लिए दूसरी भाषा सीखना भी मुमकिन है।
आप वयस्क हैं, और यही आपकी बढ़त है। यह तरीका इसलिए काम करता है क्योंकि यह मज़बूत, टिकाऊ यादें बनाता है। आपके लिए भाषा सीखना मुमकिन है। जानिए कि सही तरीके से भाषा सीखना कैसा लगता है। आज ही Synapse आज़माइए। चलिए, शुरू करते हैं।